रविवार, 4 अक्टूबर 2026

जब अब उनकी याद आती है

 एक सपना देखा था ख्वाब बुने थे गैरों की गैरत ने तब उन्हें तबाह किया, हश्र तो उनका जो होना था वह तो नहीं हुआ,  पर जो सपने में भी नहीं सोचा था उनका वही हुआ ! उनकी जिंदगी में शाम सबेरे वह थे; उनके रात रात भर जग कर गृहस्थी संभालने सँवारने  के  ख्वाब थे उनके और पिता जी तब थे पूरा परिवार था सबकी चिंता थी। 

वह हमेशा उनकी हरकतों पर गुस्से में थे पर हमने नहीं सुना ! उनका बड़ा बडपन्न था ! जब सब कुछ सहा-गहा. पर तब हम सब थे. भावुक जब-जब उन्होंने कुछ भी हमें कहा,आज समझ में नहीं आ रहा तब ये पागलपन क्यों रहा है ? जिनकी वजह से और आज उनकी औलादों से जिनकी वजह से परिवार की मर्यादा तहस नहस हुई ?

फिर भी जब अब उनकी याद आती है तब लगता है वह सही थे, उनका सपना सही था उन्होंने बड़ा सोचा अपने को खपा दिया पर वह जो हमेशा अपने लिए जिए और किये उसे ही शायद समाज देश और असभ्यता कहा जाता है ---------------!

नमन है आपकी सभ्यता को !




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