सोमवार, 23 मार्च 2026

हमें हमारी मोनालिसा पर नाज़ है

 


हमें हमारी मोनालिसा पर नाज़ है क्योंकि जिस मोनालिसा की बात आमतौर पर की जाती है वह निश्चित रूप से एक देश की बहुमूल्य पेंटिंग है और जिस समय की वह पेंटिंग है उस समय तकनीकी सामग्री आदि की जो बात थी हम कह सकते हैं कि आज हम उससे बहुत विकसित हो गए हैं लेकिन विकसित होने के बावजूद भी जो आज की मोनालिसा है अगर उनको ठीक से पेंट किया गया है तो उसको आप कम नहीं समझ सकते। 

अब यह अलग बात है कि इस मुल्क में खास करके तस्वीरों को लेकर के जो उदासी है वह अपने आप में किसी मुल्क को बहुत कमजोर करती है और इस कमजोरी का खामियाजा आज इस मुल्क का रचनाकार या कहे की हजारों और लियोनार्दो डा विंची जैसे लोग धूल फाक रहे हैं। जबकि न जाने कितने ऐसे लोग जिन्हें इस विधा की कोई समझ नहीं है और यहां तक की साहित्य संगीत इत्यादि की भी समझ नहीं है वह किस आनंदलोक में जी रहे हैं वह भी बहुत महत्वपूर्ण सवाल है।  इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि कभी आपको वक्त मिले तो मेरी मोनालिसाओं से जरूर मिलिए उनमें भारत की बहुसंख्यक आबादी की बेहिसाब हिसाब अभिव्यक्ति है स्वभाव, भाव और परिस्थितियों से आपको रूबरू कराती हैं या होती हैं।  यही कारण है कि हम अपने चित्रों के साथ जितना न्याय कर सकते हैं करने की कोशिश करते हैं लेकिन हमारा नकलची समाज उसको उस नजरिए से नहीं देख पाता। जिसको उस नजरिए से देखने की जरूरत है। 

अब सवाल यह है कि हम उन चित्रों को पूरी दुनिया के स्तर पर जिस तरह से देखते हैं वह देखने की दृष्टि और भारतीय चित्रों को देखने की दृष्टि में मूलभूत फर्क है यहां का सभ्य समाज भी कलाओं के प्रति बहुत ही उदास है आमतौर पर उसकी समृद्धि में साहित्य और कला की कोई जगह ही नहीं है यही कारण है कि धीरे-धीरे हमारी कलाएं हमारा साहित्य हमारा दर्शन निरंतर कमजोर होता जा रहा है और उसकी बड़ी जिम्मेदारी उस बड़े समाज पर भी है जो राजाओं महाराजाओं की जगह ले चुका है और किसी ने किसी रूप में पूरे सिस्टम को खोखला कर रहा है।  ऐसे खोखले होते दौर में उन राजनेताओं की जिम्मेदारी खासकर के और बढ़ जाती है जो इन सारी विधाओं का जिस तरह से सामान्यीयकरण कर रहे हैं और इसे आम तौर पर सड़क की चीज बनाने में लगे हुए हैं वह भी दया के पात्र ही माने जाएंगे। 


क्योंकि उनके कामों में इसकी कोई प्राथमिकता नहीं है बल्कि वह इसका जितना दोहन करने पर लगे हुए हैं यह इनकी मानसिक सोच को उजागर कराती है। जिस तरह से देश के संसाधनों का बड़ा उपयोग कर रहे हैं वह बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गया है।  कला की दुर्दशा भी बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गयी है इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि न जाने कब वह दौर आएगा जब इन सब संपदा को हम संभाल पाएंगे।  देश में जितने बड़े कलतीर्थ हैं उससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि यह हमारे गौरव का क्षेत्र रहा है।  पूरी दुनिया में भारतीय कला का जो स्थान है वह इतना ऊंचा है की जिसको हम कह सकते हैं कि वह पूरे संसार की एक अद्भुत धरोहर है उस धरोहर को बचाए रखना उस पर काम करना कितना सहज है या कितना बिगड़ चुका है इसका अंदाजा लगाना आज के दौर में जरा मुश्किल काम है।  

अब हम कितनी भी कोशिश करें लेकिन जो दूरी बढ़ गई है वह कम करनाआसान नहीं है और ऐसे हालात में कलाओं का जो हस्र हो रहा वह निश्चित तौर पर धीरे-धीरे-धीरे हमारी सोच को कमजोरकर रहा है। इसलिए हम आपको अपनी बातों के प्रमाण में अपने कुछ चित्रों से रूबरू कराते हैं जिससे आपको यह समझने में सुविधा होगी कि हम किस दौर की बात कर रहे हैं।  यह मानने से और न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इसके होने से और न होने से बहुत फर्क पड़ता है। यही है सांस्कृतिक साम्राजयवाद की जकड जिससे निकलना आसान नहीं है ?

डॉ लाल रत्नाकर 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

श्रद्धांजलि सभा (अजय कुमार यादव 'बजरंगी')

 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

श्रद्धांजलि सभा (अजय कुमार यादव 'बजरंगी')

जो 6 फरवरी 2026 को हमसब को छोड़कर चले गये :
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जिस परिवार का सदस्य होने के नाते अपने सामने जिनको खोते हुए देखा है उनमें दादी पिताजी छोटा भाई और फिर उससे छोटा भाई उनसे पहले उनकी पत्नी। यह भी अजीब विडंबना है की परिवार में परिवार की जिस गरिमा और मर्यादा को इन लोगों ने उच्च स्थान दिया था उन्हीं लोगों ने उसे तोड़ डाला। 

प्रेमचंद जी ने अपनी बहुत सारी कहानियों में ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है इससे साबित होता है कि यह सब कुछ एक दिन का नहीं है हमेशा होता आया है।यह कथन कि "घटनाएं एक दिन की नहीं, हमेशा से होती आई हैं," ऐतिहासिक और सामाजिक निरंतरता को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि कुप्रथाएं, संघर्ष, या मानवीय व्यवहार, जैसे कि भेदभाव या प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना, अचानक नहीं पैदा होते, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जो व्यवस्थागत समस्याओं की ओर इशारा करते हैं। ऐतिहासिक निरंतरता: किसी भी समस्या या घटना को एकाएक नहीं, बल्कि लंबे समय की सामाजिक संरचनाओं के परिणाम के रूप में देखा जाता है।उदाहरण: सामाजिक मुद्दों, जैसे कि भेदभाव या किसी एक समुदाय के खिलाफ अत्याचार, यह बताते हैं कि यह कोई नई बात नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। प्रतिकूलता: जैसे कि बाढ़ के दौरान लोगों को ज़रूरी चीज़ें जुटाने के लिए मजबूर होना, या व्यक्तिगत जीवन में सफलता प्राप्त करने में कई प्रयास करना पड़ना, ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि यह सब हमेशा से ही होता आया है।  यह विचारधारा इस बात पर जोर देती है कि जब हम किसी विशिष्ट घटना पर बात करते हैं, तो हमें उस पूरी प्रक्रियाको समझना चाहिए जो उस घटना के लिए जिम्मेदार है ।


अजय कुमार यादव 'बजरंगी'
का आकस्मिक निधन 6 फरवरी 2026 को सायंकाल लगभग सात आठ बजे साम हो गया। यह खबर हमें शाम 8.30 बजे पूजा के फोन से पता चला आज सुबह ही मैं जौनपुर से ट्रेन से गाज़ियाबाद आया था। अब यह समय ऐसा था जो किसी भी तरह से ट्रेन जहाज से जाना संभव नहीं था इसलिए तय हुआ की अपनी कार से रात ही निकल लेते हैं। 
मैं पत्नी और संदीप संतोष रात में 10 बजे निकलकर सुबह साढ़े सात बजे गाव पहुँच गया अब घर पर अंतिम संस्कार के लिए तैयारी शुरू हो गयी लगभग एक घंटे में घर से निकलकर रामघाट के लिए निकल लिए बहार सड़क तक हमलोग आये और बहुत सारे लोग आये जिनमे श्री अजय यादव डिम्पल गावं के गेट पर आ गए वह हमारे साथ घाट तक साथ रहे। 
बचपन :
अजय कुमार यादव (बजरंगी ) 0 1 जनवरी 1965 डॉ रमापति और श्रीमती मत्ती के तीसरे पुत्र के रूप में को इनका जन्म हुआ जबकि (यह चौथे पुत्र थे ) 1. डॉ.लाल रत्नाकर (लाल साहब)  2 . राय साहब (बचपन में ही इनका निधन हो गया ) 3 .अशोक कुमार यादव (गुलाब ) (अल्प आयु की अवधि में सड़क दुर्घटना में इनका निधन जब यह जौनपुर में राजकीय बालिका विद्यालय में प्राध्यापक थे उस समय हो गया था। 
शिक्षा :
अजय कुमार यादव (बजरंगी ) की शिक्षा इंटरमीडिएट के बाद बी ए में प्रवेश लिए लेकिन पढ़ाई आगे नहीं किये वह अब बड़े हो गए थे इनकी रूचि सामाजिक एवं कृषि कार्यों में पिता जी के साथ सहयोगी के रूप में बढ़ी फिर यह मुंबई गए और वहां कुछ रिश्तेदारों के साथ ड्राइवर के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। 
कैरियर :
यह मुंबई गए और वहां कुछ रिश्तेदारों के साथ ड्राइवर के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। तत्कालीन परिस्थितियों में यह एक अच्छे ड्राइवर हो गए थे। हालांकि यह बात हमेशा कष्टकारी रहेगी की यह अपने इस उद्यम के साथ परिवार में मझोले चचा के संपर्क और उनको महत्त्व देते रहे तथा उनके जल में फास गए जो समय समय पर बम्बई जाते रहे रहे और आर्थिक शोषण करते रहे ऐसा उनके आचरण और बेईमानी के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। 
यह यही वक़्त था जब इनके साथी अपनी ट्रकें खरीद रहे थे और व्यवसाय को खड़ा कर रहे थे लेकिन यह उसी चाचा के हाथ की कठपुतली की तरह लूट और बर्वाद हो रहे थे। 
कैरियर में बदलाव :
यह यही वक़्त था जब इनके साथी अपनी ट्रकें खरीद रहे थे और व्यवसाय को खड़ा कर रहे थे लेकिन यह उसी चाचा के हाथ की कठपुतली की तरह लूट और बर्वाद हो रहे थे। यही कारण था की इनका इस क्षेत्र में मन उचट रहा था धीरे धीरे यह गांव की और मुखातिब हुए मुझे एक घटना याद है तब मैं गाजियाबाद के कालेज में पहुँच गया और एक आवास ले रहा था जिसके लिए चचा को आर्थिक सहयोग के लिए आग्रह किया तब उन्होंने इनके साथ फोन पर यह राय दिए की वहां घर लेने की क्या जरुरत है कौन आर्थिक सहयोग करता यह उलटे उनकी हाँ में हाँ मिलते हुए बहुत ही निराश किये। 
और उसके पैसे से यहाँ ऊंट पटांग निर्माण के नाम पर लूट रहे थे। 


शनिवार, 29 जनवरी 2011

ये पुरखों का घर है !

ये पुरखों का घर है !
यहीं हम पले बढे और इतने बड़े हुए हैं.
क्या किया उन्होंने जिनको कमान दे दी थी या ले लिए थे। 
विनाश की हर फितरत को उन्होंने आजमाया 
और किसपर ?