हमें हमारी मोनालिसा पर नाज़ है क्योंकि जिस मोनालिसा की बात आमतौर पर की जाती है वह निश्चित रूप से एक देश की बहुमूल्य पेंटिंग है और जिस समय की वह पेंटिंग है उस समय तकनीकी सामग्री आदि की जो बात थी हम कह सकते हैं कि आज हम उससे बहुत विकसित हो गए हैं लेकिन विकसित होने के बावजूद भी जो आज की मोनालिसा है अगर उनको ठीक से पेंट किया गया है तो उसको आप कम नहीं समझ सकते।
अब यह अलग बात है कि इस मुल्क में खास करके तस्वीरों को लेकर के जो उदासी है वह अपने आप में किसी मुल्क को बहुत कमजोर करती है और इस कमजोरी का खामियाजा आज इस मुल्क का रचनाकार या कहे की हजारों और लियोनार्दो डा विंची जैसे लोग धूल फाक रहे हैं। जबकि न जाने कितने ऐसे लोग जिन्हें इस विधा की कोई समझ नहीं है और यहां तक की साहित्य संगीत इत्यादि की भी समझ नहीं है वह किस आनंदलोक में जी रहे हैं वह भी बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि कभी आपको वक्त मिले तो मेरी मोनालिसाओं से जरूर मिलिए उनमें भारत की बहुसंख्यक आबादी की बेहिसाब हिसाब अभिव्यक्ति है स्वभाव, भाव और परिस्थितियों से आपको रूबरू कराती हैं या होती हैं। यही कारण है कि हम अपने चित्रों के साथ जितना न्याय कर सकते हैं करने की कोशिश करते हैं लेकिन हमारा नकलची समाज उसको उस नजरिए से नहीं देख पाता। जिसको उस नजरिए से देखने की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि हम उन चित्रों को पूरी दुनिया के स्तर पर जिस तरह से देखते हैं वह देखने की दृष्टि और भारतीय चित्रों को देखने की दृष्टि में मूलभूत फर्क है यहां का सभ्य समाज भी कलाओं के प्रति बहुत ही उदास है आमतौर पर उसकी समृद्धि में साहित्य और कला की कोई जगह ही नहीं है यही कारण है कि धीरे-धीरे हमारी कलाएं हमारा साहित्य हमारा दर्शन निरंतर कमजोर होता जा रहा है और उसकी बड़ी जिम्मेदारी उस बड़े समाज पर भी है जो राजाओं महाराजाओं की जगह ले चुका है और किसी ने किसी रूप में पूरे सिस्टम को खोखला कर रहा है। ऐसे खोखले होते दौर में उन राजनेताओं की जिम्मेदारी खासकर के और बढ़ जाती है जो इन सारी विधाओं का जिस तरह से सामान्यीयकरण कर रहे हैं और इसे आम तौर पर सड़क की चीज बनाने में लगे हुए हैं वह भी दया के पात्र ही माने जाएंगे।
क्योंकि उनके कामों में इसकी कोई प्राथमिकता नहीं है बल्कि वह इसका जितना दोहन करने पर लगे हुए हैं यह इनकी मानसिक सोच को उजागर कराती है। जिस तरह से देश के संसाधनों का बड़ा उपयोग कर रहे हैं वह बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गया है। कला की दुर्दशा भी बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गयी है इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि न जाने कब वह दौर आएगा जब इन सब संपदा को हम संभाल पाएंगे। देश में जितने बड़े कलतीर्थ हैं उससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि यह हमारे गौरव का क्षेत्र रहा है। पूरी दुनिया में भारतीय कला का जो स्थान है वह इतना ऊंचा है की जिसको हम कह सकते हैं कि वह पूरे संसार की एक अद्भुत धरोहर है उस धरोहर को बचाए रखना उस पर काम करना कितना सहज है या कितना बिगड़ चुका है इसका अंदाजा लगाना आज के दौर में जरा मुश्किल काम है।
अब हम कितनी भी कोशिश करें लेकिन जो दूरी बढ़ गई है वह कम करनाआसान नहीं है और ऐसे हालात में कलाओं का जो हस्र हो रहा वह निश्चित तौर पर धीरे-धीरे-धीरे हमारी सोच को कमजोरकर रहा है। इसलिए हम आपको अपनी बातों के प्रमाण में अपने कुछ चित्रों से रूबरू कराते हैं जिससे आपको यह समझने में सुविधा होगी कि हम किस दौर की बात कर रहे हैं। यह मानने से और न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इसके होने से और न होने से बहुत फर्क पड़ता है। यही है सांस्कृतिक साम्राजयवाद की जकड जिससे निकलना आसान नहीं है ?
डॉ लाल रत्नाकर


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