स्वास्थ्य की बात करें तो उसका कोई लेखा जोखा नहीं है आमतौर पर किसी भी स्तर के परिवार के पास उनके स्वास्थ्य का कोई लेखा जोखा नहीं होता है। एक विकल्प :
डॉ लाल जी सिंह ने आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए कलवारी जौनपुर के अपने गांव में एक प्रोजेक्ट शुरू किये थे उसकी पोजीशन क्या है ? यह जानकारी करके लिखेंगे !
डॉ. लालजी सिंह ने अपने गांव कलवारी (जौनपुर) में “जीनोम फाउंडेशन” के माध्यम से आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया था। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण और वंचित लोगों को सस्ती और सुलभ जेनेटिक जांच व उपचार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से था। वर्तमान में यह फाउंडेशन उनके निधन (2017) के बाद भी सक्रिय है और स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ा रहा है।
डॉ. लालजी सिंह और उनका स्वास्थ्य प्रोजेक्ट
पृष्ठभूमि
जन्म: 5 जुलाई 1947, कलवारी गांव, जौनपुर, उत्तर प्रदेश
उपाधि: “भारतीय डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जनक”
निधन: 10 दिसंबर 2017, वाराणसी
जीनोम फाउंडेशन
स्थापना: 2004 में
उद्देश्य:
ग्रामीण भारत में जेनेटिक बीमारियों की पहचान और उपचार
सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी तक पहुँचाना
डीएनए आधारित जांच को जनसामान्य के लिए उपलब्ध कराना
कलवारी गांव में प्रोजेक्ट
डॉ. सिंह ने अपने पैतृक गांव कलवारी, जौनपुर में इस फाउंडेशन का विस्तार किया।
यहां से ग्रामीणों को जेनेटिक टेस्टिंग, डायग्नोसिस और परामर्श की सुविधा दी जाती थी।
इसका मकसद था कि गरीब और वंचित वर्ग भी आधुनिक विज्ञान की मदद से बेहतर स्वास्थ्य पा सके।
वर्तमान स्थिति
2017 में उनके निधन के बाद भी फाउंडेशन सक्रिय है।
यह संस्था आज भी ग्रामीण स्वास्थ्य और जेनेटिक रिसर्च पर काम कर रही है।
फाउंडेशन का मुख्यालय हैदराबाद में है, लेकिन कलवारी गांव में शुरू किया गया प्रोजेक्ट उनकी विरासत का हिस्सा है।
महत्व और प्रभाव
इस प्रोजेक्ट ने ग्रामीण भारत में जेनेटिक बीमारियों की पहचान को संभव बनाया।
फोरेंसिक विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं में डीएनए तकनीक का लाभ आम जनता तक पहुंचा।
डॉ. सिंह की सोच थी कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों तक पहुंचे।
👉 संक्षेप में, कलवारी गांव का स्वास्थ्य प्रोजेक्ट डॉ. लालजी सिंह की दूरदर्शी पहल थी, जो आज भी जीनोम फाउंडेशन के माध्यम से जारी है और ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने में योगदान दे रहा है।
जन्म: 5 जुलाई 1947, कलवारी गांव, जौनपुर, उत्तर प्रदेश
उपाधि: “भारतीय डीएनए फिंगरप्रिंटिंग के जनक”
निधन: 10 दिसंबर 2017, वाराणसी
जीनोम फाउंडेशन
स्थापना: 2004 में
उद्देश्य:
ग्रामीण भारत में जेनेटिक बीमारियों की पहचान और उपचार
सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी तक पहुँचाना
डीएनए आधारित जांच को जनसामान्य के लिए उपलब्ध कराना
कलवारी गांव में प्रोजेक्ट
डॉ. सिंह ने अपने पैतृक गांव कलवारी, जौनपुर में इस फाउंडेशन का विस्तार किया।
यहां से ग्रामीणों को जेनेटिक टेस्टिंग, डायग्नोसिस और परामर्श की सुविधा दी जाती थी।
इसका मकसद था कि गरीब और वंचित वर्ग भी आधुनिक विज्ञान की मदद से बेहतर स्वास्थ्य पा सके।
वर्तमान स्थिति
2017 में उनके निधन के बाद भी फाउंडेशन सक्रिय है।
यह संस्था आज भी ग्रामीण स्वास्थ्य और जेनेटिक रिसर्च पर काम कर रही है।
फाउंडेशन का मुख्यालय हैदराबाद में है, लेकिन कलवारी गांव में शुरू किया गया प्रोजेक्ट उनकी विरासत का हिस्सा है।
महत्व और प्रभाव
इस प्रोजेक्ट ने ग्रामीण भारत में जेनेटिक बीमारियों की पहचान को संभव बनाया।
फोरेंसिक विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं में डीएनए तकनीक का लाभ आम जनता तक पहुंचा।
डॉ. सिंह की सोच थी कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों तक पहुंचे।
👉 संक्षेप में, कलवारी गांव का स्वास्थ्य प्रोजेक्ट डॉ. लालजी सिंह की दूरदर्शी पहल थी, जो आज भी जीनोम फाउंडेशन के माध्यम से जारी है और ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने में योगदान दे रहा है।
माटी के लाल: 'डीएनए फिंगर प्रिंट' के जनक डॉ लालजी सिंह का माटी से प्यार रहा बरकरार, विदेशों में भी मनवाया अपनी प्रतिभा का लोहा
सार
प्रख्यात डीएनए वैज्ञानिक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. लालजी सिंह का जन्म 5 जुलाई 1947 को जौनपुर जिले के कलवारी गांव में हुआ था। ग्रामीण परिवेश से निकले इस मेधा ने न सिर्फ कर देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

पद्मश्री डॉ लालजी सिंह - फोटो : फाइल फोटो




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