बुधवार, 29 दिसंबर 2010

खबर छपी थी अखबारों में


इस गाँव की गलियों ने ही 
हसना रोना और भागना 
हमको है सिखलाया .
पर छुपना यहाँ बड़ा मुश्किल था
लोग सभी घर गाँव के अपने 
पर कोई पराया था या 
यह तब समझ नहीं थी 
सबका घर अपना घर था 
था कोई नहीं पराया                                                     
चौपालों में धूम चौकड़ी 
खलिहानों की लूका छुपी 
पर हमने उनमे खेल खेल में 
कभी न आग लगाया .
खबर छपी थी अखबारों में 
चाचा के खलिहान जल गए 
आशा नहीं थी जिनसे उनको 
उनसे ही यह भूल हुयी थी 
सब्र बड़ा था तब भी उनमे 
जब पता चला भतीजों ने ही 
अपना करम बिगाड़ा। 
इस गाँव की गलियों ने ही 
हसना रोना और भागना 
हमको है सिखलाया . 

-डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 17 मार्च 2010

मेरा घर

डॉ.लाल रत्नाकर

मेरे घर के .......................................................
सलामत सपने
बचेंगे कैसे


इनको देखो
घूम रहे बंजारा
बनके जब


सलामत है
इज्जत कहाँ जब
संभाले मन


मनमाना ये
मन विचलित है
संतोष नहीं

सोमवार, 1 मार्च 2010

सोमवार, 23 नवंबर 2009

बुधवार, 26 अगस्त 2009

मेरा घर


मेरा घर
बड़े अरमान से घर
हमने बनाया था कभी
पर
आज वहा रहने का वहाँ वक़्त कहाँ
जिनपे हक हुकूमत
और अपनापन
वहाँ सौगात का है वक़्त कहाँ
बड़े जतन से जिसे
एक एक ईंट चुना
आज उनके लिए यहाँ वहां,
सब कुछ बचा न बचा
जब
हम वतन ही कहाँ .