शनिवार, 22 अगस्त 2009

सपना

सपना
डॉ.लाल रत्नाकर

जिसने एक सपना देखा था
ख्वाब बुने थे
गैरों की गैरत ने
तब उन्हें तबाह किया
हश्र तो उनका जो होना था
वह तो नहीं हुआ
पर जो सपने में भी नहीं था सोचा
उनका वही हुआ
शाम सबरे हम थे उनके
रात रात भर ख्वाब थे उनके
और पिता जी
थे गुस्से में पर हमने नहीं सुना
उनका बड़ा बरपन्न था
जब सब कुछ सहा गहा.
पर हम सब तब थे भावुक
जब जब उन्होंने कुछ भी हमें कहा .
आज समझ में नहीं आ रहा
तब पागलपन ये क्यों रहा ?

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